आत्मधार्म

एक अंतिम पड़ाव पर पहुँचकर धर्म के बंभन से आत्मा मुक्त हो जाती है ।क्योकि आत्मा का एकही धर्म है " आत्मधार्म "बस ,वही बाकी रह जाता है ।

ही..का..स..योग [ ५ ]

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