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समर्पण

"आज विश्व में जितनी भी ध्यान की पद्धतियाँ हैं , उन पध्दतियों में या तो सांस पर चित्त रखकर ध्यान किया जाता है या भस्त्रिका प्राणायाम करके ध्यान किया जाता है। समर्पण ध्यान कोई भी उपरोक्त पध्दती नहीं है। समर्पण ध्यान कोई ध्यान की पध्दती नहीं है। यह तो एक पवित्र आत्मा द्वारा एक पवित्र आत्मा पर किया गया एक संस्कार है। बस , यह संस्कार पाने के लिए पवित्र आत्मा होना पड़ता है और परमात्मा के माध्यम द्वारा परमात्मा को पूर्ण समर्पित होना पड़ता है। बस , 'संस्कार' घटित हो जाता है!"      बाबा स्वामी *आत्मेश्वर (आत्मा ही ईश्वर है।) पृष्ठ : ८*

मनुष्य का चित्त

प्रत्येक सुबह मनुष्य का चित्त भी एक छोटे बच्चे की तरह होता है। आप सुबह-सुबह चित को जो भी आकार दो वैसा ही वह दिनभर बना रहता है। *सुबह उठने के बाद के हमारे दो धण्टे बड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं।* *अगर हमें सुबह के समय दो धण्टे अपने चित्त को भीतर रखना आ गया तो फिर स्थिर रहना (चित का)  और शुद्ध रहना स्वयं ही हो जाएगा।* बाबा स्वामी          

चैतन्य का बरसना गुरु की प्रसन्नता पर ही निर्भर

चैतन्य का बरसना गुरु की प्रसन्नता पर ही निर्भर कर्ता है। गुरु अच्छे भाव के कारण, प्रेम के कारण, आत्मीय भाव के कारण, समूहिकता के कारण प्रसन्न होते है। और जब प्रसन्न होते है, वह चैतन्य बरसने के लिए उचित माध्यम बनता है। और जब उपयुक्त माध्यम बनता है, तभी उसके माध्यम से परमात्मा का चैतन्य बरसने लगता है।  बाबा स्वामी HSY 1 ph 295

आत्मज्ञान से आत्मशक्ति

आत्मज्ञान से आत्मशक्ति बढ़ती है और आत्मशक्ती के बिना आत्मसंयम सम्भव ही नहीं है और आत्मसंयम के बिना शारीरिक शक्ती कूछ काम की नहीं है। आत्मसंयम मेन बिना शारीरिक शक्ती असंतुलित हो सकती है, शरीर की शक्ती वासनामय हो सकती है, शारीरिक शक्ती मोहमय हो सकतीं है, शारीरिक शक्ती अमानवीय भी हो सकती है।  पर कार्य के प्रति किया गया सतत समर्पण का भाव आत्मसंयम का निर्माण कर देता है। बाबा स्वामी HSY 2 pg 19

गुरु का अंतिम लक्ष्य

प्रत्येक गुरु का अंतिम लक्ष्य शिष्य की आत्मा को जगाना होता है। और गुरु चाहते है की शिष्य की आत्मा जागृत हो और वह आत्मा इतनी सशक्त हो की वह आत्मा ही शिष्य की गुरु हो जाए। यह हो जाना तभी सम्भव होता है, जब अहंकार का समर्पण भी शिष्य कर देता है।  बाबा स्वामी HSY 1 pg 297

आत्मेश्वर (आत्मा ही ईश्वर है)

आप लोगों में 'आत्मीयता' की कमी है। और उसका मुख्य कारण आपका मैं का सूक्ष्म अहंकार ही है।  *आपका 'अहंकार' मेरे गुरूकार्य की सबसे बड़ी बाधा है।* *संपूर्ण सकारात्मक विश्वचेतना का नाम ही 'परमात्मा' है।* साधकों की 'आध्यात्मिक स्थिति' पर ही आश्रमों का निर्माण संभव होगा। *जब चुनाव होता है , तब 'वोट' अवश्य दें , क्योंकि वह आपका एक प्रकार का राष्ट्रीय कर्तव्य भी है।* *कट्टर धार्मिक व्यक्ति कभी भी आध्यात्मिक स्थिति को नहीं पा सकता है।* *30 मिनट ध्यान को समय  अवश्य दो। ध्यान लगे या न लगे यह तुम्हारा क्षेत्र नहीं है।* *अरे बाबा , बाहर की परिस्थिती खराब इसलिए हुई है क्योंकि भीतर की स्थिति खराब है।* ------ बाबा स्वामी  *आत्मेश्वर* (आत्मा ही ईश्वर है)

Samarpan Meditation Quotes

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