आत्मज्ञान से आत्मशक्ति

आत्मज्ञान से आत्मशक्ति बढ़ती है और आत्मशक्ती के बिना आत्मसंयम सम्भव ही नहीं है और आत्मसंयम के बिना शारीरिक शक्ती कूछ काम की नहीं है। आत्मसंयम मेन बिना शारीरिक शक्ती असंतुलित हो सकती है, शरीर की शक्ती वासनामय हो सकती है, शारीरिक शक्ती मोहमय हो सकतीं है, शारीरिक शक्ती अमानवीय भी हो सकती है।  पर कार्य के प्रति किया गया सतत समर्पण का भाव आत्मसंयम का निर्माण कर देता है।
बाबा स्वामी
HSY 2 pg 19

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