ब्रह्मनाद

प्रकृति का भी एक नाद है। उस नाद को जानना होगा, उसे सुनना होगा। जब वह सुनायी देना चालू हो जाए तो वही नाद भीतर भी बजना प्रारम्भ होता है। जब आपका चित भीतर होता है तो वह नाद निकलना प्रारम्भ हो जाता है। उस नाद को ब्रह्मनाद कहते है।

बाबा स्वामी
HSY 1 pg 155

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