कुंडलिनी

स्वयंसिद्ध व्यक्ति या सिद्धि प्राप्त गुरु के सान्निध्य में उनके स्पर्श अथवा दृष्टिपात करने से कुंडलिनी जागृत हो सकती है।

सद्गुरु श्री शिवकृपानंद स्वामीजी सिर्फ दृष्टिपात से हर शिबिर के दरम्यान शिबिरार्थियों की कुंडलिनी जागृत करते है। इसे स्थाई तथा वृद्धिशील बनाए रखने के लिए शिबिरार्थी को शिबिर के बाद प्रतिदिन ध्यान योग का नियमित अभ्यास करना चाहिए। इससे साधक (शिबिरार्थी ) की नियमित रूप से आध्यात्मिक तथा आधीभौतिक उन्नति होती है।

मधुचैतन्य जुलाई २००१ पृष्ठ:८

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