सद्गुरु का समाधि स्थल वह 'दिवा-दांडी'

" सद्गुरु का समाधि स्थल वह 'दिवा-दांडी' है जो भटके हुए जहाजरुपी आत्माओ को सही दिशा का संकेत आनेवाले युगो-युगो तक देते रहता है ।

सद्गुरु अपने जीवन मेँ सबकुछ बाँटता ही रहा है ।

इसीलिए उसके समाधि-स्थल पर जाने के बाद कुछ बाँटने का भाव , कुछ सेवा का भाव आ जाता है ।

भौतिक साधनो के उपभोग से उतनी खुशी नही मिलती जितनी बाँटने से मिलती है ।

तो आप बाँटकर,दूसरोँ को खुश करके दूसरोँ के माध्यम से खुशी प्राप्त करते हैँ । "

" एक समाधि-स्थल तो एक विश्वविद्यालय जैसा होता है जो पवित्र आत्माओँ रुपी विद्यार्थियोँ का निर्माण करता है।
जिनसे समाजसेवा ऐसे ही घटित हो जाती है।

कई लोगोँ को अपने सद्गुरु के माध्यम से समाजसेवा की प्रेरणा मिली है।

आध्यात्मिकता मेँ आने के बाद मनुष्य केवल अपने बारे मेँ नहि सोचता।
उसका चित्त विशाल हो जाता है और अन्य लोगो की भलाई के बारे मेँ सोचता है।

फिर एक आध्यात्मिक व्यक्ति से समाजसेवा अनायास ही हो जाती है और उसमेँ कर्ता का भाव नहि होता है।

आध्यात्मिकता समाजसेवा की प्रेरणास्त्रोत होती है। "

- H.H.Shree Shivkrupanand Swamiji

From :
Spiritual Truth.

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