जीवंत गुरु, जीवंत समाधि

।।आशीर्वचन।।

🌹जीवंत गुरु, जीवंत समाधि 🌹

● जो मनुष्य जन्मा है, उस मनुष्य को एक दिन तो जाना ही है।यानी जाने के लिए ही मनुष्य जन्म लेता है।जन्म लेकर अपने भोग भोगता है और जाता है।

● मनुष्य की मृत्यु हो जाने के बाद, कहते हैं कि, उसकी आत्मा तीन दिनों तक इसी अंतराल में रहती हैं । और तीन दिनों के बाद वह अपनी गति को प्राप्त करती हैं। वह आत्मा अपने शरीर की मृत्यु देखती है,उसका दहन-संस्कार देखतीं हैं। उसके जाने के बाद उसके रिश्तेदार, उसके संबंधी, उसके मित्र कैसा शौक मनाते हैं, वह सब अपने शरीर की मृत्यु के बाद देखती है। ऐसा ही एक अनुभव मुझे अपने आश्रम में हुआ । मैने आश्रम मे मेरी ही मृत्यु देखी, मृत शरीर देखा। शरीर मृत होने पर घटनेवाली घटना देखी। क्या घटना घटी और उसका वातावरण पर क्या प्रभाव हुआ वह देखा, उस प्रभाव में, सारे वातावरण में जो साधक आए, उन पर हुआ प्रभाव देखा है। यह घटना एक संपूर्ण घटनाचक्र की कड़ीमात्र थी।

● मैंने मेरी मृत्यु को आठ शक्तिकेन्द्रो के रूप में बांटा है और यह प्रक्रिया मृत्यु तक भी चलती ही रहेगी क्योंकि यह कार्य करने के लिए ही मेरा निर्माण किया गया है। अभी तक, एक गुरु अपने जीवनकाल में केवल एक शिष्य को अपनी सारी शक्तियां सौंप करके ही देहत्याग करता था। और फिर वह शिष्य भी अपने जीवनकाल में एक शिष्य को ही अपनी शक्तियां दे पाता था। पर इस प्रक्रिया में एक गुरु देनेवाला होता था, तो एक शिष्य पाने की इच्छा रखनेवाला होता था। गुरु की देने की इच्छा पूर्ण हो जाती थी, पानेवाले की पाकर  इच्छा पूर्ण हो जाती थी। पर ८०० सालों की इस प्रक्रिया में यह महसूस किया गया कि यह शक्तियों का ज्ञान तो सदैव सिमटकर ही रह रहा है। एक निश्चित क्षेत्र में ही वह घूम रहा था। इस चक्र के बाहर निकलने की आवश्यकता लगी। यानि फिर महसूस किया कि अब ऐसे माध्यम का निर्माण किया जाए, जो न तो देनेवाला हों और न पानेवाला हो, वह केवल बांटनेवाला हो।

● इसलिए, अपनी इच्छाशक्ति से गुरूओ ने एक ऐसे माध्यम का निर्माण किया जिसमें न तो देने की इच्छा है और न पाने की इच्छा है । वह इन दोनों से परे है । देने की इच्छा होगी तो वह पाने की प्रतिक्रिया मात्र होगी । यानी एक से पाया है, तो एक ही को देगा,  पर जिसनें पाने की भी इच्छा नहीं रखी, फिर भी पा लिया, वह एक को नहीं, अनेक को बाँटेगा । और यही प्रयोग सफल रहा । उन्होंने मेरे माध्यम के रूप में ऐसा माध्यम तैयार किया कि जिसने पाया ही है तो बस बाँटने के लिए । क्योंकि माध्यम तो संपूर्ण था । उसके पास रखने के लिए जगह ही नहीं थी । तो जब भर गया तो वह बहेगा ही । और वह बहा और जीवनभर एक बड़े जलप्रपात की तरह बहता रहा । जिस आत्मा को अपनी चित्तशुद्धि की आवश्यकता महसूस हुई, वह आत्मा आई और इस जलप्रपात मे अपने चित्त को शुद्ध करके चली गई । जिस किसी आत्मा को आध्यात्मिक प्यास लगी, तब वह इस जलप्रपात पर आई, अपनी आध्यात्मिक प्यास बुझाई और चली गई । वह अपने ही निश्चित स्थान पर सदैव बहता ही रहा है । पर मनुष्य का जीवन एक छोटा-सा जीवन है । वह इतनी, ८०० सालों तक की तपस्या का फल बाँटने मे असमर्थ हैं। अनेक जन्मों की ज्ञान की गंगा एक जन्म में तो नहीं बह सकतीं । उसे बहने के लिए ८०० साल ही चाहिए ।

● यह ज्ञान की गंगा अगले ८०० सालों तक ऐसी ही बहती रहे, इसलिए मूर्तियों की स्थापना का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ है। सदगुरु का ८००सालो का ज्ञान मैं साथ में लेकर जाना नहीं चाहता। वह ज्ञान भी बांटना चाहता हूं। वह बांटना भी ८ मूर्तियों के माध्यम से होगा और इस ओर मैं धीरे-धीरे बढ़ रहा हूं। ऐसी ही दूसरी मूर्ति यु.के. के लिए निर्मित की गई और ४५ दिनों तक अनुष्ठान कर उसमें शक्तियां संक्रमित की गई और उस मूर्ति को यु.के. भेजने के दिन घटी यह घटना है।

● सुबह से प्रतीक्षा चल रही थी कि ट्रक आएगी और पेकिंग करके मूर्ति उसमें रखी जाएगी। प्र उस समय इतने अधिक उत्साह का वातावरण हो गया था, सारा आश्रम ही चैतन्ययुक्त लहरियों से भर गया था, मानो कोई बड़ा उत्सव ही मनाया जा रहा हो। बड़ी सुबह से ही सारे साधक नहाकर तैयार खड़े थे। मूर्ति के साथ सिंहासन भी भेजा जाना था, उसकी भी पेकिंग १० बक्सों में की गई थी। उन बक्सों पर नंबर डाले गए थे, पते लिखे गए थे। सब तैयारीयां हो चुकी थी। अब प्रतीक्षा थी तो बस मूर्ति की विदाई की।

● वह ट्रक सुबह थोड़ी देर से आईं  थी उस ट्रक के आते ही सारे साधकों में उत्साह का वातावरण छा गया। सभी लोग उस ट्रक को लेकर 'श्री॑॑ गुरुशक्तिधाम' गई, वहां पर ट्रक को व्यवस्थित रूप से लगाया और मैं एक कोने में बैठकर सब देख रहा था। उस स्थापित मूर्ति को जैसे ही साधकों ने नमस्कार किया और हिलाया तो वातावरण में चैतन्य का एक विस्फोट ही हुआ। सारे वातावरण में ही चैतन्य बहने लग गया। सारे वातावरण में उत्साह व प्रसन्नता महसूस की जा सकती थी। संपूर्ण समाधि की स्थिति वहां अनुभव की जा सक ती थी। मेरे शरीर का.

....आठवां हिस्सा संपूर्ण सूक्ष्म शरीर में बदल गया था। मेरे शरीर का आठवां हिस्सा मोक्ष प्राप्त कर गया था। वह जाते-जाते उन सभी साधकों को मोक्ष का प्रसाद बांट गया था जो इस घटना के समय उपस्थित थे। वहां पर मोक्ष का प्रसाद मानो बांटा गया। पानेवाले साधक गिने-चुने ही थे। और इस प्रसाद के कारण ही, उन्हें एहसास ही नहीं हुआ कि हम किसे विदा कर रहे हैं। विदाई जैसे ग़म का कहीं नामोनिशान नहीं था। सब चैतन्य का प्रसाद पाकर खुश थे, प्रसन्न थे। बड़े भाव से उन्होंने मूर्ति को उठाया और एक बड़े लकड़ी के बक्से में रखा। बड़े भाव से उसे कपड़े लगाए। उसे धक्का न लगें, ऐसा सामान रखा। बड़ी शान्ति के साथ, बड़े उत्साह के उस लकड़ी के बक्से के ऊपर का ढक्कन लगाया। *मैं उस बक्से में बैठकर महसूस कर रहा था कि 'आळंदी' (आलंदी) में ऐसे एक बड़े पत्थर को मेरे ऊपर रखकर मुझे पहले भी ऐसे बंद किया जा चुका है। आज वही क्षण मैंने फिर ८०० सालों के बाद अनुभव किया था। वैसा ही जीवंत समाधि का अनुभव फिर से मैंने किया।

● उस बक्से को बंद कर एक साधक बक्से को खिले (कील) ठोक रहा था। इतनी देर से, इतने खिले ठोक रहा था, मानो वह बक्सा अब कभी खोला ही नहीं जाएगा। यह क्रिया उसके हाथों से हो रही थी। वास्तव में, सब चैतन्य का प्रभाव था। फिर सबने मिलकर बक्से को उठाया और ट्रक में रखा।

● मैं दूर कोने में बैठकर यह सब आत्मा बनकर देख रहा था। मेरे जाने के बाद मेरी विदाई कैसे होने वाली है, उसकी थोड़ी-सी झलक मुझे उस कार्यक्रम में हो गई। फिर सब साधको ने उत्साह से भोजन-प्रसाद ग्रहण किया और मेरी विदाई की। मैं सोच रहा था कि इन साधको को पता भी नहीं है कि वे इस विदाई कार्यक्रम से क्या पा गए है। मोक्षरुपी प्रसाद पाकर भी सामान्य ही थे, मानो कुछ हुआ ही न हो। एक शून्य की स्थिति उन्हें प्राप्त हो गई थी क्योंकि मोक्ष पाने के बाद पाने के लिए कुछ रह ही नही जाता है। और मैने मेरे समाधिस्थ होने का अनुभव किया था। स्थूल से सूक्ष्म में रूपांतरित होने का वह आश्चर्यकारक अनुभव एक यादगार अनुभव था।

● सूक्ष्म शरीर की कोई सीमा नही है। उसका कार्यक्षेत्र बहुत ही व्यापक होता है। वह जब तक किसी जीवंत शरीर की सीमा में होता है, वह बँधा हुआ होता है। पर जब वह संत समाधिस्थ होता है, तब वह सूक्ष्म शरीर के बंधन से मुक्त हो जाता है।

● सूक्ष्म शरीर को भी अपना कार्यक्षेत्र विकसित करने के लिए स्थूल शरीर की आवश्यकता होती है। वह स्थूल शरीर के माध्यम से अपने आपको बड़ा करता है। लेकिन स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर में परिवर्तित होता है, तो यह एक अलग ही अनुभव है। ऐसा ही अनुभव उस दिन मुझे ही नही, वहाँ उपस्थित प्रत्येक साधक को हुआ था। उस अनुभव से मैंने प्रत्यक्ष शरीर का रुपांतरण सूक्ष्म स्वरुप में होते देखा। इस रुपांतरण को आप शरीर की मृत्यु और सूक्ष्म शक्तियो का जन्म भी कह सकते है। मैंने जीवंत समाधि का ही अनुभव किया जो (मैं) आठ भागो में लेने वाला हूँ। उसका दूसरा भाग घटित होते देखा। अब तीसरा भाग निर्मित करने का उत्साह और भी बढ़ गया ताकि ' तीसरे माध्यम'  से, जो ' कॅनडा ' जाने वाला है, फिर वह स्थूल से सूक्ष्म के रूपांतरण का अनुभव प्राप्त होगा। अब उस हेतु थोडी साधना करनी होगी। और मैं उस साधना में लीन हो गया। अपने-आपके विसर्जन के लिए  विसर्जन साधनारत हो गया।

आपका अपना
बाबा स्वामी

१३/७/ २००८, रविवार
मधुचैतन्य- जु.अ.सि.- २००८

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