आप समर्पण मे परमात्मा की ' अनुभूति ' प्राप्त कर चुके हो और आप मूर्ति की आवश्यकता नही

आप  समर्पण  मे  परमात्मा  की  ' अनुभूति ' प्राप्त  कर  चुके  हो  और  आप  मूर्ति  की  आवश्यकता  नही  समझते है  तो  यह  मूर्ति  आपके  लिए  नही  है । आप  याने  साधक  और  साधक  याने  आप  नही  है । आपके  अलावा  भी  भविष्य  मे  जो  साधक  आनेवाले  है ,यह  मार्ग  उनके  लिए  बनाया  जा  रहा  है । आपकी  भी  तो  इच्छा  है -- जो  आपको  मिला  है , वह  परमानंद  और  आत्माओं  को  भी  मिले  और  इसलिए  आप  समर्पण  ध्यान  का  प्रचार  भी  करते  हो । क्योंकी  आप  जानते  हो  जीतना  यह  ज्ञान  बाँटेगे  ,उतना  ही  बढ़ेगा । उतनी  ही  आपकी  आध्यात्मिक  उन्नति  होगी । आप  आपका  कार्य  केवल  आपके  जीवन  मे  ही  कर  सकते  हो  और  करना  चाहते  हो  क्योकि  आपकी  समझ  सीमित  है , आपकी  दृष्टि  संकुचित  है , संकीर्ण  है । अगर  आप  अपने  सदगुरु  की  दृष्टि  से  देखो , तो  यह  वह  ज्ञान  है  जो  ८०० सालों  की  साधना  के  बाद  समाज  तक  पहुँचा  है । और  यह  मेरा  अंतिम  जन्म  है । इसके  बाद  यह  गुरुकार्य  करने  का  मौका  न  मुझे  मिलेगा  और  न  तुम्हे  क्योकि  उसके  बाद  जन्म  ही  नही  है ।....
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परम पूज्य गुरुदेव
[ आध्यात्मिक सत्य ]  
 

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