मैंने पास जाकर पहले उनका भ्रम दूर करने का प्रयास किया और कहा," मैं परमात्मा नहीं हूँ।
मैंने पास जाकर पहले उनका भ्रम दूर करने का प्रयास किया और कहा," मैं परमात्मा नहीं हूँ। मैं आप जैसा एक सामान्य मनुष्य हूँ। जैसे आज आप तूफान में बहकर आये हो, ऐसे एक दिन मैं भी बहकर आया था। यहाँ पर मेरे गुरुदेव की कुटीर है। मैं उन्हीं के साथ रहता था । कुछ दिन पूर्व ही मेरे गुरुदेव ने देह त्याग किया है।" मैने वातावरण को थोड़ा सामान्य करने का प्रयास किया। उस वृद्ध ने अगुआई करते हुए कहा," प्रभो इस विश्व में परमात्मा तो कण कण में ही फैला है। आपको कहाँ अनुभव हुआ,वह महत्वपूर्ण है। हमें आपमें अनुभव हुआ, हमारे लिए आप ही परमात्मा हैं। आपकी कृपा से ही हमारे प्राण बचे हैं।प्रभो, परमात्मा किसे मानना है यह आत्मा का शुद्ध भाव है। बस, आत्मा जिसे मान ले, वही परमात्मा है। हमें आपके दर्शन करके ऐसा अनुभव हुआ कि हमने परमात्मा को पा लिया है। हिमालय का समर्पण योग -२ पृष्ठ २६
Comments
Post a Comment