कई शिष्य अपने गुरुद्वव के शरीर के अति निकट होने के कारण गुरुदेव को अनुभव नहीं कर पाते है।

कई शिष्य अपने गुरुद्वव के शरीर के अति निकट होने के कारण गुरुदेव को अनुभव नहीं कर पाते है। क्यूँकि पुस्तक जिस प्रकार आँखो से चिपकाकर पढ़ी नहीं जा सकती है, वैसे ही गुरुदेव के शरीर के सान्निध्य में अनुभव नहीं किया जा सकता है। और अनुभव करने के लिए गुरुदेव से पर्याप्त दूरी बनाना अत्यंत आवश्यक होता है। शिष्या यह बात समजे या न समजे, गुरुदेव तो यह बात जानते ही हे। इसलिए गुरुदेव अपने  शिष्य को सदैव दूर रखते ही है। *_

- HSY 1 pg 302

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