ध्यान करते करते साधक का मन इतना निर्दोष , इतना पवित्र हो जाता है
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ध्यान करते करते साधक का मन इतना निर्दोष , इतना पवित्र हो जाता है की वह एक अबोध बालक के समान हो जाता है । साधक को गुरुचरणों मे ही संपूर्ण सृष्टि नजर आती है । उसे गुरुचरणों में अपने माता -पिता , अपने बंधु -सखा का दर्शन होता है तो वही उसे जीवन का आदि और अंत भी गुरुचरणों में ही नजर आता है ।..................
[ परम पूज्या * गुरुमाँ * ]
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