मनुष्य शरीर के आवरण के साथ जन्म लेता हे और शरीर के आवरण में ही रहता हे ।
मनुष्य शरीर के आवरण के साथ जन्म लेता हे और शरीर के आवरण में ही रहता हे । और आवरण गिर जाने के बाद उसको मालूम पड़ता हे के ये तो आवरण था । जो अब नहीं रहा । शरीर एक वाहन हे, आत्मा चालक हे । वाहन के बिना चालक आगे नहीं बढ़ सकता । लेकिन ये भी सच हे की चालक के बिना वाहन भी आगे नहीं बढ़ सकता । इसलिए किसको किसकी जरूरत हे ? ये कभी जान नहीं सकते । दोनों अपनी जगह पे सही हे और दोनों एक दुसरे के पूरक हे । इसलिए मंजिल पाने के लिए दोनों को समजना आवश्यक हे । दोनों का तालमेल और दोनों का संतुलन अगर हम रख सके, तभी हम मंजिल के पास पहुँच सकते हे ।
🌺प.पु.श्री शिवकृपानंद स्वामीजी🌺
🌼सुप्रभात🌸
🌷आपका दिन मंगलमय हो🌷
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