सान्निध्य

*सभी पुण्य आत्माओं को मेरा नमस्कार ....*

*आज से 'गहन ध्यान अनुष्ठान' का प्रारंभ हुआ है। गुरूशक्तियाँ तो सदैव हमारे साथ ही होती हैं। लेकिन हमें उसका कभी एहसास नहीं होता है। वह बहुत पवित्र एवं शुद्ध होती हैं। और हमारा चित्त 'सदैव' और 'सतत' शुद्ध स्थिति में नहीं होता है। और इसी लिए गुरूशक्तियाँ साथ होने पर भी अनुभव नहीं होती है।*

*गुरूशक्तियों का शुद्ध और पवित्र 'एहसास' का 'सान्निध्य' 'सदैव' और 'सतत्' अनुभव हो , इसी के लिए यह 'गहन ध्यान अनुष्ठान' का आयोजन गुरूशक्तियों ने किया है। लेकिन उसके लिए हमें भी अपने चित्त को 'शुद्ध' व 'पवित्र' रखना होगा। और वह तभी रहेगा जब आप ४५ दिन के अनुष्ठान में दूसरों में चित्त नहीं डालेंगे , 'पुराने विचार' नहीं करेंगे, भविष्य की 'चिंता' नहीं करेंगे। इन ४५दिनों में आपका ध्यान केवल 'गुरूचरण' पर ही होगा। और 'सतत' और 'सदैव' होगा।*

*'सद्गुरू' आपके हृदय के द्वार पर खड़ा है। बस आपका हृदय का द्वार खोल कर अनुभव करो। तभी आप इस गहन ध्यान अनुष्ठान में शामिल होंगे। सारा आपका ध्यान आपको क्या दिख रहा है , उधर नहीं, क्या अनुभव हो रहा, उधर होना चाहिए। क्योंकि जो दिखता है , वह स्थाई नहीं है , शाश्वत नहीं है। इन ४५ दिनों में गहन ध्यान में आई अनुभूतियाँ आपकी प्रगति के नए द्वार खोलेंगी।..........*

*आपका*
*बाबा स्वामी*
*६/०१/२०१२,(४.०० सुबह )*

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