ब्रह्मानंद गुरुदेव

ब्रह्मानंद गुरुदेव कुछ कंद-मूल तोड़कर लाते थे । वे जो देते थे,वह खाता था । पहले आठ-दस दिन तो उन्होंने मुझे वहाँ की प्रकृति के साथ जुड़ना सिखाया।
वे कहते ,थे "यह झरने का पानी बह रहा है, उसे देखो, गौर से देखो और देखते ही
रहो । वह एक निश्चित व्यवस्था के अधीन
बह रहा है " वह पहले कैसे गिरता है, बाद में कैसे गिरता है और बाद में किस क्रम में
गिरता है, उसका एकाग्रता से अध्ययन करो । उसमें प्रकृति एक संदेश दे रही है,उसे समज़ो ।

हि. का. स.यो. 1 पेज 31

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