मेरे पूरे हिमालय-प्रवास में मुझे आज तक कोई साध्वी कभी नहीं मिली।

पता  नहीं कितने सालों से वे  मुनि वहाँ रह रहे थे।उनके घर वाले शायद उनकी आने की राह भी देख रहे हों या उन्हें भूल गए हों क्योंकि उन्हें वहाँ आए काफी वर्ष हो गए थे।सामान्यतः कुछ साल राह देखकर मनुष्य भूल जाता है।पता नहीं, उनके घर में क्या हुआ होगा!कई तो इतने बूढ़े थे कि वे अगर वापस जाते तो उनके घर की दुनिया ही बदल गई होती। अगर उनको पहचानने वाले शायद जीवित ही नहीं रहे होते,तो वे घर वापस जाते भी तो उन्हें कोई पहचानता ही नहीं , उन्हें ही अपनी पहचान करानी होती। मैं भी ,पता नहीं ,उनके बारे में क्या-क्या सोच रहा था!वहाँ पर कोई स्त्री नहीं थी।मेरे पूरे हिमालय-प्रवास में मुझे आज तक कोई साध्वी कभी नहीं मिली।और वहाँ जो ऋषि-मुनि हैं,वे स्त्रियों को वहाँ आने भी नहीं देना चाहते हैं। सभी ने अपने आभामण्डलों से सीमाएँ बाँध दी हैं और उसमें वे किसी स्त्री को आने ही नहीं देना चाहते हैं।ऐसे क्यों हुआ होगा?एक दिन सुबह पहाड़ के एक कोने में बैठकर इसी पर सोच रहा था,
" क्या सचमुच स्त्री आध्यात्मिक साधना में बाधक है?ऐसा है या ऐसा माना जाता है?...

हि.स.यो-४                
पु-३५८

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