प्रत्येक मनुष्य को मोक्ष पाने का अधिकार है तो फिर स्त्रियों को क्यों नहीं है?
जबकि आत्मिक स्तर पर तो कोई भिन्नता नहीं है और प्रत्येक मनुष्य को मोक्ष पाने का अधिकार है तो फिर स्त्रियों को क्यों नहीं है?आज एक स्त्री की सहायता से ही मैं यहाँ तक आ सका हूँ। तो मेरा तो अनुभव अलग ही रहा है। मेरे जीवन में पत्नी के आने के बाद ही सारी आध्यात्मिक प्रगति हुई है। मेरा अनुभव दुनियाँ से अलग क्यों है?यहाँ पर स्त्री नहीं है पर ये स्त्री देवता की उपासना तो कर ही रहे हैं। ये ऐसा क्यों हो रहा है कि स्त्री देवता चाहिए पर स्त्री नहीं चाहिए?ऐसा कब से हुआ होगा और ऐसे क्यों हुआ होगा?
ध्यान से एक स्थिति प्राप्त होती है। वह स्थिति प्राप्त होने के बाद स्त्री और पुरुष यह भेद ही समाप्त हो जाता है। क्योंकि दोनों में एक ही आत्मा है,स्त्री की आत्मा अलग और पुरुष की आत्मा अलग ,ऐसा कुछ नहीं होता है। जो भिन्नता है,वह शरीर की है। और लिंग तो प्रत्येक जन्म में अलग-अलग हो सकता है। स्त्री प्रत्येक जन्म में स्त्री ही होती है और पुरुष प्रत्येक जन्म में पुरुष ही होता है,
ऐसा भी नहीं है। प्रत्येक जन्म के साथ लिंग बदल सकता है। यदि स्त्री इतनी बुरी है तो फिर स्त्री देवता की उपासना क्यों?वह भी नहीं होंनी चाहिए। और अगर आत्मजागृति से स्त्रियों को वंचित रखा तो आधे से ज्यादा मनुष्यसमाज तो आत्मज्ञान से वंचित ही रह जाएगा क्योंकि संसार में आधी तो स्त्रियाँ ही हैं।...
हि.स.यो-४
पु-३६०
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