आध्यात्मिक प्रगति के लिए संघ की बडी आवश्यकता
" आध्यात्मिक प्रगति के लिए संघ की बडी आवश्यकता है क्योंकि प्रगति के लिए आवश्यक गुण एक आत्मा में हो ही, यह आवशयक नहीं है। लेकिन संघ की सामूहिकता में वे गुण स्वयं निर्मित हो जाते हैं और सामूहिकता में आत्मा की वह प्रगति होती है जो अकेले कभी हो ही नहीं सकती। सदैव अकेले ध्यान करने
जैसी शारीरिक और मानसिक स्थिति हो, यह आवश्यक नहीं है। लेकिन सामूहिकता में वह स्थिति एक-दूसरे की मदद से मिल जाती है।
इसीलिए कहते हैं, सामूहिकता में एक और एक दो नहीं होते, ग्यारह होते हैं। और सदगुरु तो एक चलता-फिरता संघ ही होता हैं। वह शरीर दिखने में भले एक ही हो लेकिन वह शरीर लाखों आत्माओं से जुडा हुआ होता हैं।
सदगुरु की आत्मा प्रत्येक जन्म के साथ आत्माओं को केवल जोडते रहती है। कुछ आत्माएँ उसे छोड देती हों, वह किसी को नहीं छोडती है क्योंकि छोडना उसका स्वभाव ही नहीं है। इसीलिए सदगुरु के अंतिम जन्म में लाखों आत्माएँ उनसे जुडती हैं।
हि.स.योग.४, पेज. ३३५.
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