कुण्डलिनी शक्ति स्त्री स्वरुप

"  इस विश्व को चलाने वाली विश्वशक्ति है और वही विश्वशक्ति प्रत्येक मनुष्य  में कुण्डलिनी शक्ति के स्वरुप में होती है।  यह कुण्डलिनी शक्ति स्त्री स्वरुप में  है और उसकी साधना से ध्यान लगता है।  और एक स्त्रीशक्ति से स्त्रियों को वंचित रखा गया था! वास्तव में, अगर स्त्रियाँ ध्यान करें तो ध्यान में अधिक जल्दी प्रगति कर सकती हैं क्योंकि समर्पित होने का भाव स्त्रियों में जन्म से होता ही है।

वे अगर समर्पित हो गई तो वे शून्य हो जाएँगी और विश्व की सारी चेतना उनके हाथों से चैतन्य के रूप में बहने लग जाएगी और वे स्वयं भी विश्वचेतना का अच्छा माध्यम बन जाएँगी।  और वे अगर एक बार माध्यम बन गई तो गुरुकार्य अधिक अच्छी तरह से हो सकेगा और उन्हें भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति करने का अवसर प्राप्त होगा।

किसी छोटे-से अंस को गर्भ में धारण करना, उसे सँभालना, उसे वृद्धि गत करना, उसे जन्म देना, यह तो स्त्री का जन्मजात गुण है। उस गुण के कारण वे चैतन्य की अनुभूति को भी ग्रहण करेंगी, उसे सँभालेगी, उसे वृद्धिगत करेंगी और चैतन्य का प्रचार-प्रसार करके उसे पूर्णत्व प्रदान करेंगी। पता नहीं क्यों, मुझे उस दिन स्त्रियाँ ही समर्पण ध्यान की प्रचारिका लगने लग गई।

हि.स.योग.४, पेज. ३६६.

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