सारे मुनि और तपस्वी एक ही स्थान पर एकत्र हों,ऐसा स्थान मैंने हिमालय में कहीं नहीं देखा था।

उन सभी मुनियों की बोलने की शैली  एक-जैसी ही थी। कई तो इतने धीमे बोलते थे कि अगर अपना पूर्ण ध्यान न हो तो सुनाई न आए।वहाँ एक गुफा ऐसी थी जहाँ पर अग्नि का कुण्ड था और वहाँ सदैव आग जलती रहती थी। प्रायः सभी वहीं से आग लेकर जाते थे। वे अग्नि को बड़े सम्मान से रखते थे,ले जाते थे।उतनी ऊँचाई पर भी वहाँ की गुफाओं में उनके साथ कबूतर रहते थे। कई कबूतरों ने उस पहाड़ को ही अपना निवास बना लिया था।
प्रत्येक मुनि का अनुभव भी अलग-अलग था,प्रत्येक मुनि का वहाँ आने का कारण भी अलग-अलग था। अलग-अलग स्थानों से आए थे,अलग-अलग भाषाओंवाले थे। उनकी शिक्षा के स्तर भी अलग-अलग थे।लेकिन इतनी अलग बातें होने पर भी वे एक-से लगते थे। बड़ा आत्मीय संबंध उनका आपस में था।इतना अच्छा संघ मैंने मेरे जीवन में देखा हीं नहीं था।और हिमालय में तो घूमते हुए मुझे बहुत साल हो गए थे लेकिन,इतने सारे मुनि और तपस्वी एक ही स्थान पर एकत्र हों,ऐसा स्थान मैंने  हिमालय में कहीं नहीं देखा था। मानों प्राकृतिक रूप से  बना हुआ  वह एक आश्रम ही रहा।...

हि.स.यो-४                  
पु-३५७

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