सभी धर्मों के मूलतत्व का आधार मनुष्यता

परमात्मा एक वैश्विक चेतनाशक्ति है। उसमें अपने अस्तित्व को समाहित कर उस परमात्मा के माध्यम को जो भी अनुभव आया , वही अनुभव उस माध्यम ने उपदेश के रूप में लोगों को बताया और वही उपदेश बादमे धर्म बन गये।
सभी माध्यमों ने अपनी बात अनुभूति के आधार पर की थी। बस बादमे उस अनुभूति को ही भुला दिया गया और लोगों ने बस उपदेश को पकड़ लिया।
बने हुए धर्म अनुभूति विहीन हो गए। बाद में धर्म तो पुस्तकों में सिमट कर रह गए और इसी कारण धर्मों का अपनी आवश्यकता नुसार लोगों ने उपयोग करना शुरू किया।
सभी धर्मों के मूलतत्व का आधार मनुष्यता था। वही नष्ट हो गया और फिर , धर्म ही मनुष्यता नष्ट करने का कारण बने। आज धर्मों के नाम पर बड़े-बड़े युद्ध और नरसंहार हो रहे है और हो चुके है और भविष्य में भी होंगे क्योंकि आधार ही समाप्त हो गया।

*॥आध्यात्मिक सत्य॥*
(समर्पण ध्यान का मिशन)

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