आत्मधर्म

आत्मधर्म अनुभूति परआधारित है जिसे अपनाने वाले मनुष्य कोई खराब कार्य करना भी चाहें तो भी नहीं कर सकते हैं। इसमें प्रधर्शन नहीं है, दिखावा नहीं है
क्योंकि यह बाहरी नहीं होता है।इसमें जो भी होता हैं,वह भीतरी होता है।आत्मधर्म का पालन करने वाले सभी लोग अच्छे होंगे। जो सामान्य मनुष्य में बुराईयाँ होती हैं,वे उनमें नहीं होंगी।वे झूठ बोलना भी चाहें तो भी वे नहीं बोल सकेंगे।यह अनुभूति का ज्ञान हैऔर सभी ने इसेअनुभव करके देखना चाहिए।इस अनुभूति के ज्ञान को पाने के लिए कोई शर्त नहीं है। इस अनुभूति के ज्ञान पाने के लिए तुम्हें तुम्हारे जीवन में बुरी बातें छोड़ने की भी आवश्यकता नहीं है।क्योंकि बुरी बातों की सबकी अपनी-अपनी परिभाषा होती है। युवा पीढ़ी को केवल जोड़ना है,अपने जीवन में जोड़ना है अनुभूति को। और एक बार अनुभूति का ज्ञान जुड़ गया तो बुराईयाँ छूट ही जाएँगी।
इस ध्यान पध्दति का विशेषता है--अनुभूति का होना। और यह अनुभूति शायद और कहीं नहीं है। ईश्वर की सर्वप्रथम अनुभूति का सबसे पहला अनुभव होता है-- "अच्छा लगा " यह मनुष्य को हुई प्रथम अनुभूति है। यह आत्मा के द्वारा दिया हुआ संकेत है, प्रमाण है--यह स्थान पवित्र है,यह पध्दति सही है।...

हि.स.यो-४              
पु-४४६

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