वे पादरीजी बोले , मैं जप करता हूँ लेकिन इस प्रकार का ध्यान मैंने जीवन में प्रथम बार किया। यह सब आप कैसे कर लेते हैं ! मैंने कहा , कुछ नहीं , मैं अपने-आपको एक आत्मा समझता हूँ तो शरीर की आवश्यकता या समस्या मेरे पास नहीं है। और फिर मेरे आत्मा को जो शांति और समाधान प्राप्त हुआ है वह मैं सभी आत्माओं में बाँटना चाहता हूँ। मुझे ऐसा लगा कि मुझे तो गुरूकृपा में मिल गया लेकिन सभी को यह गुरुसन्निध्य मिलता नहीं है। इसीलिए यह अनुभूति एक प्रसाद के समान बाँट रहा हूँ। उन्होंने कहा , में एक चर्च के साथ जुड़ा हूँ और वहीं रहता हूँ। भविष्य में मैंने यह कार्यक्रम आयोजित किया तो आप आएँगे क्या ? मैंने कहा , अवश्य आऊँगा। वे बोले , मुझे यह ध्यान बहुत अच्छा लगा , एकदम सभी विचार बंद हो गए थे। वो बोले , यह ध्यान किसी भी धर्म पर आधारित नहीं है। मैंने कहा , यह हमारा भीतर का धर्म आत्मधर्म पर आधारित है। बाहर के धर्म तो हमने जन्म लेने के बाद धरण किए हैं। और यह बाहर के धर्म तो प्रत्येक जन्म के साथ बदलते रहेंगे। लेकिन यह आत्मा का धर्म तो प्रत्येक जन्म में साथ रहेगा।
भाग - ६- १७८/१७९
Comments
Post a Comment