यानी कोई स्त्री हिमालय के भीतर प्रवेश भी करना चाहे तो भी नहीं प्रवेश कर सकती है। लेकिन जैसे- जैसे उन मुनियों की तपस्या बठती गई , वैसे - वैसे शरीर का भाव ही समाप्त हो गया और शरीरभाव समाप्त हो गया टी यह लिंग का भेद ही समाप्त हो गया और उस ध्यान की ऊँचाई पर पहुँचकर उन्होंने जाना कि शरीर तो आत्मा का आवरण मात्र है। यह प्रत्येक जन्म के साथ बदलता है। और जो बदलता है , अस्थाई है उसे आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई स्थान नहीं है , कोई महत्व नहीं है।
भाग १६५/१६६

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