बड़े महाराजश्री

वहाँ पर कोई प्राणी उनका शिकार करने आए,इसकी संभावना नहीं थी क्योंकि वह जगह हमारे पहाड़ से नीचे के पहाड़ पर थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो ये पहाड़ तो पहाड़ों पर पहाड़ थे,बहुत ही ऊँचाई पर थे। जब वहाँ से हमारा पहाड़ देखा, तब जाना,हम वहाँ के पहाड़ों में से सबसे ऊँचे पहाड़ पर  रह रहे थे। तब लग रहा था कि बड़े महाराजश्री वहाँ आने वाले प्रथम मनुष्य थे,वे कैसे आए होंगे और कैसे चढ़े होंगे!क्योंकि हमारा पहाड़ उन सभी पहाड़ों से
कई गुना अधिक ऊँचा था। यानी
इतनी ऊँचाई पर चढ़ने की इच्छा होना....कैसे यह सब हुआ होगा!  या तो यह संभावना है कि उन्होंने उस पहाड़ का चयन इसलिए किया होगा कि वे समाज से जितना हो सके उतना,अधिक-से-अधिक दूर जाना चाहते थे ताकि वे समाज सेअधिकतम दूर जाकर ध्यान साधना  कर सकें।या ऐसा भी हुआ होगा, वे पहले नीचे के पहाड़ों पर रहते होंगे और बाद में उस ऊपर के पहाड़ पर चढ़े होंगे। और साँस लेने की दृष्टि से हममें से प्रत्येक को ऐसा ही करना पड़ता था।ऊँचाई पर एकदम नहीं जाया जाता,चढ़ते समय आठ-आठ दिवसों तक नीचे Jनिवास करते हुए फिर चढ़ना पड़ता है। लेकिन नीचे आते समय प्राणवायु की उतनी समस्या नहीं होती है। वैसे थंड (ठण्ड) उतनी नहीं लगती थी लेकिन हवा जब चलती थी,तब अधिक ठण्ड  लगती थी और वस्त्रहीन होने के कारण हवा सीधे शरीर पर ही लगती थी।...

हि.स.यो-४                   
पु-३८९

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