समर्पण ध्यान
१. प्रत्येक मनुष्य के जीवन की सफलता का रहस्य इस बात पर निर्भर है कि वह मनुष्य का जीवन कितना संतुलित है।
२. संतुलन से हमारा आशय आहार के संतुलन, शरीर के स्वास्थ्य के संतुलन, विचारों के संतुलन तथा उसके द्वारा किए गए कार्य के संतुलन से है। इन सबके संतुलन से एक संतुलित मनुष्य बनता है।
३. मनुष्य को संतुलित करने के लिए मनुष्य ने कुछ कायदे, कानून बनाए हैं। पर वे पर्याप्त नहीं हैं। क्योंकि वे किनुन मनुष्य के द्वारा ही निर्मित हैं, इसलिए उसमें मनुष्य कोई ना कोई रास्ता. निकाल ही लेता है।
४. मनुष्य को संतुलित रख सकता है स्वयं मनुष्य। वह अगर चाहे कि संतुलन का कानून नहीं तोडना है, तो वह खभी भी नहीं तोडेगा।
५. प्रश्न उठता है- मनुष्य को स्वयं मनुष्य ही कैसे नियंत्रित करेगा। मन बडा चंचल है और बुद्धि नए-नए तर्क निकाल लेती है। इसलिए मनुष्य को स्वयं पर नियंत्रण करने के लिए सामूहिकता की आवश्यकता होती है।
६. सामूहिक शक्ति से जुड़े होने के बाद ही सामूहिक शक्ति के कारण स्वयं का स्वयं पर नियंत्रण होने लगता है क्योंकि आप सामूहिक रूप से नियंत्रित, स्वशासित आत्माओं की सामूहिकता में जुडे रहते हो।
७. हमारे शरीर में जो आत्मा होती है, वह परमात्मा का शुद्ध स्वरूप, हम उसके द्वारा अनेक आत्माओं के साथ जुड सकते हैं।
८. 'समर्पण ध्यान' से एक आत्मा अनेक आत्माओं की सामूहिक शक्ति से जुड जाती है।
९. अनेक आत्माओं के सान्निध्य के कारण एक आत्मा भी आत्मबल प्राप्त कर बलवान हो जाती है।
१०. आत्मा शक्तिशाली हो जाती है, तब आत्मा का ही नियंत्रण संपूर्ण शरीर पर हो जाता है।
आध्यात्मिक सत्य, पृष्ठ. ५५-५६.
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