_* आत्मशांति की दिशा भीतर ही है। इसका ज्ञान मनुष्य को नहि है। वह ज्ञान एक बार मनुष्य को हो जाए, वह आत्मशांति पा ही लेगा। क्यूँकि मनुष्य आत्मशांति चाहता तो है, खोज भी रहा है, पर आत्मशांति की खोज बाहर हो रही है। बस उसे सही दिशा देने की आवश्यकता है। *_
_* जय बाबा स्वामी*_
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_*HSY 1 pg 441*_

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