Aneri:
*॥जय बाबा स्वामी॥*
*आरती द्वारा परमानंद की अनुभूती*
*१) अग्नी देवता का महत्व:-*
आरती के समय हम अग्नीदेवता को सामने रखकर आराध्य देव या गुरु के चित्र के ईर्द-गिर घुमाते हैं क्योंकि अग्नी का गुणधर्म है- दूषित ऊर्जा को नष्ट करना। आरती के समय हमारा , देवता की दैवीक शक्ति के साथ , एकलय हो जाता है। यानि की हम उस शक्ति के साथ जुड़ जाते हैं। जिससे हमारे ऑरा या आभामंडल की दूषित ऊर्जा अपने आप दूर हो जाती हैं। इस तरह से अनायास ही अग्नीदेवता के सान्निध्य में हमारे ऑरा की सफाई होती है।
*२)ध्वनी :-*
आरती के समय घंटानाद , सुर-ताल , लय वगैरह से ॐकार रुपी ब्रह्मनाद उत्पन्न होता है जिसे मूहिकता में एक सूर में गाने के कारण हमारा चित्त एकाग्र होता है और वह सहस्त्रार पर स्थिर हो जाता है जिसके जरिए हमें अपने आप निर्विचार की स्थिति प्राप्त हो जाती है। हमारे मन की चंचलता कम होती है और हम एक सुख और शांती का अनुभव करते हैं।
नैमिषा लालाजी
*मधुचैतन्य अक्टूबर ११/२७*
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*॥जय बाबा स्वामी॥*
"शिष्य की गुरु से आत्मीयता होनी चाहिये। आत्मीयता होगी श्रद्धा से।....आत्मीयता होने पर ही गुरु की बात उसी अर्थ में समझी जा सकती है , जिस अर्थ में गुरु बोल रहा है।"
*हिमालय का समर्पण योग १*
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