समर्पण भी प्रतिदिन करने की आवश्यकता होती है
समर्पण भी प्रतिदिन करने की आवश्यकता होती है क्योंकि हमारे आसपास के बुरे
विचारों से हमारे समर्पण के भाव पर बुरा प्रभाव पड़ता है | समर्पण तो आत्मा
का शुध्ध भाव है, उसकी शुध्धता सदैव बनी रहनी आवश्यक है | जैसे हम अगर
किसी पीतल के ग्लास को कितना भी माँजकर स्वच्छ करें तो भी एक दिन बाद उस पर
धूल जम ही जाती है और एक दिन बाद भी उसकी चमक कम हो जाती है, वैसे भी
समर्पण पूर्ण हो जाने के एक दिन बाद ही वैचारिक प्रदूषण की धूल उस पर आ ही
जाती है, इसलिए समर्पण प्रतिदिन होना चाहिए |
-हि.स.यो-४| पृष्ठ-२७९
-हि.स.यो-४| पृष्ठ-२७९
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