जब आत्मा मनुष्य शरीर धारण करती है तो उन चार-पॉंच वर्षों तक तो आत्मा का नियंत्रण शरीर पर होता है

" जब आत्मा मनुष्य शरीर धारण करती है तो उन चार-पॉंच वर्षों तक तो आत्मा का नियंत्रण शरीर पर होता है। इसलिए छोटे-छोटे बच्चों पर उनके पूर्व जन्म का प्रभाव रहता है। और जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होने लग जाता है, यह प्रभाव कम होने लगता है। और कुछ
साल बाद उसकी आत्मा ही उसके शरीर के अधीन हो जाती है।" "इसलिए हम देखते हैं कि बच्चा बड़ा होने पर पढ़ाई, परीक्षा,इन सब में खो जाता है और इस प्रकार शरीर का नियंत्रण आत्मा पर हो जाता है। और आत्मबोध मनुष्य को फिर से बचपन में ले जायेगा जहाँ पर उसे पूर्वजन्म भी याद होंगे और यह जन्म लेने का उद्देश भी याद होगा। पूर्व जन्म के कर्म अतृप्त वासनाएँ, अभिलाषाएँ ही नया जन्म लेने का उद्देश बन जाती हैं क्योंकि कोई भी आत्मा निरुद्देश्य क्यों जन्म लेगी? कोई न कोई उद्देश ही नया जन्म लेने का कारण होता है लेकिन यह उद्देश जन्म लेते समय ही याद रहता है। बाद में जन्म लेने के बाद, कुछ वर्षों के बाद आत्मा अपना उद्देश भूल जाती है। और बाद मे, शरीर छोड़ने के बाद जो तीन दिन होते है तब वह आत्मा शरीर से छूट जाती है और फिर भी उस जन्म से नहीं छूटती है और तीन दिन तक वहीं। मँडरती रहती
है। वह तीन दिन सब कुछ देखती रहती है - उसके घर में क्या चल रहा है, उसकी मृत्यु का घर पर क्या असर पड़ा है। इसलिए ऐसा माना
जाता है कि आत्मा वहीं निवास करती है।


हि.स.यो-४
पुष्ट-४७

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