आत्म ज्ञान से आत्म शक्ति बढ़ती है
आत्म ज्ञान से आत्म शक्ति बढ़ती है और आत्मशक्ति के बिना आत्म संयम संभव
नहीं है और आत्म संयम के बिना शारीरिक शक्ति कुछ काम की नहीं है।आत्मसंयम
के बिना शारीरिक शक्ति असंतुलित हो सकती है,शरीर की शक्ति वासनामय हो सकती
है,शारीरिक शक्ति मोहमय हो सकती है,शारीरिक शक्ति अमानवीय भी हो सकती है।पर
कार्य के प्रति किया गया सतत् समर्पण का भाव आत्मसंयम का निर्माण कर देता
है।इसी प्रकार का अनुभव मुझे इस ध्यान साधना के दौरान आया।एक विशिष्ट
लक्ष्य को लेकर,लक्ष्य प्राप्ति के उद्देश्य से यह ध्यान साधना
प्रारंभ की थी।और लक्ष्य था -आत्मसाक्षात्कार को वर्षों से एक गुरु से
केवल एक शिष्य तक और शिष्य से भी जीवन में केवल एक शिष्य तक ही दए जाने की
जो परंपरा चल रही थी,उसी परंपरा का विस्तार करना।यानि जो आज तक कभी नहीं
हुआ,वह करना। तो यह असंभव -सा लक्ष्य था।और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के
लिए आत्माओं को सामूहिक प्रयास करना था।इस महान लक्ष्य में आत्मसाक्षात्कार
देने वाली अनेक आत्माएँ शामिल होने वाली थीं और आत्मसाक्षात्कार लेने वाली
भी लाखों आत्माएँ शामिल होने वाली थी ।ऐसे लक्ष्य को लेकर ध्यान साधना
प्रारंभ की थी,पर धीरे -धीरे कब ध्यान साधना ही गुरमय हो गई,कब मेरा
अस्तित्व गुरुमय हो गया और कब मेरा लक्ष्य भी गुरुमय हो गया,इसका मुझे ही
पता नहीं था।सबकुछ एक ही हो गया और रह गए गुरुचरण!वहाँ जाकर सारी ध्यान
साधना विलीन हो गई।यह सब स्वाभाविक रूप से ही हो गया।सब एक हो गया था।
- हिमालय का समर्पण योग -२। पैज नंबर १३, १४
- हिमालय का समर्पण योग -२। पैज नंबर १३, १४
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