सामूहिकता में रहने की ,सामूहिक ध्यान करने की आदत तो हमें पहले से ही थी।

"सामूहिकता में रहने की ,सामूहिक ध्यान करने की आदत तो हमें पहले से ही थी।हम समाज में भी थे तो संघ के साथ ही चलते थे,संघ के साथ ही रहते थे।और वैसी ही सामूहिकता में हम यहाँ भी रहते हैं।हम आए अलग -अलग स्थानों से हैं फिर भी सामूहिकता में रहने की आदत सभी को है।इसी कारण हम यहाँ आपस मेंअच्छे-से रह पाए हैं। सामूहिकता में रहने से अहंकार पर धीर-धीरे नियंत्रण हो जाता है क्योंकि हमें हमारे दैनिक जीवन में छोटे-छोटे सामंजस्य,छोटे-छोटे तालमेल करने ही पड़ते है।ये छोटे-छोटे तालमेल ही इस सामूहिकता में रहने के प्रयास के ही भाग हैं। हम में से प्रत्येक को कुछ बातें छोड़नी पड़ी थीं। दूसरों की कुछ बातें पसंद न भी होने पर भी सहन करनी पड़ी थीं।और यह सहन करने के कारण ही हमारी सहनशक्त्ति का विकास हुआ है। मनुष्य के प्रथम कुछ वर्ष तो सामूहिकता से तालमेल बिठाने में ही चले जाते हैं।लेकिन कुछ साल रहने के बाद तो सामूहिकता जीवन का एक अंग ही बन जाती है,अकेले अच्छा नहीं लगता है। फिर तो यह स्थिति होती है कि हम अकेले भी होते हैं तो चित्त से सामूहिकता में होते हैं और सामूहिकता में होते हैं तो अकेले
ही होते हैं। जब हम अकेले होते हैं,तब हम ,अकेले न हो जाएँ,इसलिए हम हमारा चित्त सामूहिकता पर रखते हैं और जब सामूहिकता में रहते हैं तो हम अपने चित्त को भीतर ही रखने का अभ्यास करते हैं। उससे हम सामूहिकता में हों तो भी भीतर तो अकेले ही रहते हैं।यह सबकुछ वर्षों में अभ्यास से हो जाता है।"...

हि.स.यो-४                  
पु-४१५

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