जीवन में गुरूसान्निध्य ही सबकुछ

सद्गुरु एक गुलाब के फूल की तरह होते हैं | गुलाब की खुशबू देना गुलाब के फूल का स्वभाव है | वह यह गुलाब की खुशबू सबको सामान रूप से देता है | ठीक वैसे ही उनसे आत्मज्ञान की अनुभूति हमें लेनी नहीं पड़ती है और न ही उन्हें देनी पड़ती है| आत्मानुभूति देना उनका स्वभाव बन जाता है | हमें बस उनका सान्निध्य मिलना चाहिए |

जीवन में गुरूसान्निध्य ही सबकुछ है | वास्तव में मनुष्य का जन्म ही गुरु सान्निध्य के लिए हुआ है | लेकिन यह गुरूसान्निध्य मनुष्य को किस जन्म में मिलेगा ,वह निश्चित नहीं होता है | जब भी प्राप्त हो ,उसे अपने जीवन की धरोहर समझकर संजोना चाहिए | पता नहीं, वह क्षण फिर जीवन में मिले ,न मिले | क्योंकि ये क्षण वे होते हैं जिन्हें यादकर हम जीवनभर ऊर्जा पाते हैं ,जीवनभर एक आत्मिक सुख का अनुभव करते हैं | 

हि.स.यो.३/७४

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