सब गुरु की कूपा
मैंने कहा , यह सब गुरु की कूपा है। जिस प्रकार से , एक मूर्तिकार मूर्ति बनाते समय किसी विशेष स्थान की दृष्टि से मूर्ति को निर्माण करता है और वह मूर्ति उसी विशेषता के कारण ही दूसरों से अलग हो जाती है। वैसे ही , सर्वसमान्य मनुष्य जैसा दिखना ही गुरुषक्तियों का कवच है। यही सुरक्षा कवच है। इससे आप सामान्य रूप से समाज में रह सकते हो , समाज में जा सकते हो। उन्होंने ऐसा शायद इसीलिए किया है क्योंकि उन्होंने मेरे लिए कार्यक्षेत्र समाज चुना है। अगर समाज में जाना है , समाज में जाकर धर-धर तक पहुँचना है तो उसके अनुरूप ही आकर और रूप देना होगा।
भाग - ६ - ७५/७६
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