स्त्री का सबसे अच्छा रूप माँ का होता है |
समाज में सत्यशोधि पुरुषों का स्त्रियों से दूर भागना भी स्त्रियों के प्रति आसक्ति का दूसरा सिरा है | स्त्रियों की ओर आकर्षित होना एक शारीरिक भाव है | उस भाव पर नियंत्रण करने के लिए एकदम दूसरा सिरा है - स्त्रियों को देखकर कामवासना जागृत होती है, ऐसा सोचना | दोनों ही दो अति के सिरे हैं और दोनों ही सत्य नहीं है |-
स्त्री का सबसे अच्छा रूप माँ का होता है | अगर स्त्रियों के प्रति तुम्हारे मन में वैसा ही पवित्र भाव है , जैसा माँ के लिए होता है ,तो तुम्हारे आसपास कितनी स्त्रियां रहती हैं ,उससे कोई अंतर नहीं पड़ता | मुख्य बात है - भाव ; आप स्त्रियों को किस भाव से देखते हैं ? उस भाव को बदलना आसान कार्य है | --भाव को ना बदलते हुए ,भय के मारे इस प्रकार हिमालय में भाग आना कायरता है |
स्त्रियों को इस मार्ग की बाधा मत समझो | केवल अपने भीतर के भाव को बदलो | केवल यह भाव ही साधक को शारीरिक स्तर से आत्मिक स्तर पर ले जाने में सहायक सिद्ध होगा | -- फिर आपका नजरिया दूसरे को आत्मा के रूप में देखने का हो जाता है | फिर वह शरीर स्त्री का हो या पुरुष का ,क्या फ़र्क़ पड़ता है ? पर यह सब आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद ही पता चलता है |-
शरीर तो आत्मा का आवरण है | जब तक आत्मा आवरण के अधीन रहती है ,तब तक सामने वाले का आवरण ही दिखता है , पर जब आवरण आत्मा के अधीन हो जाता है ,तब केवल आत्मा ही दिखती है |
इसका ज्ञान बहुत बाद में ,अंतिम स्तिथि में होता है | उस अंतिम स्तिथि तक पहुँचने के लिए जो भी साधक चलते हैं ,वे सब एक सा ही सोचते हैं | यह सोचना आज का नहीं है | श्री गौतम बुद्ध ,श्री महावीर भी ऐसा ही सोचकर सबकुछ त्यागकर जंगल में आ गए थे | लेकिन बाद में,अंतिम स्तिथि में ये ज्ञान उन्हें भी हो गया था | सबकुछ मनुष्य के भाव पर ही निर्भर होता है |
एक तो पवित्र भाव और दूसरा,पवित्र भाव वाली सामूहिकता, ये दोनों मनुष्य को नर से नारायण बनाते हैं | नारायण कहीं बाहर नहीं है | नारायण नर के ही भीतर छुपा हुआ ,आत्मा के रूप में परमात्मा का स्वरूप है | एक बार वह ,नारायण का स्वरूप मनुष्य के भीतर प्रकट हो जाता है ,तो फिर सब बाहरी भेद समाप्त हो जाते हैं | तो जब अपना नर ही नारायण हो गया ,तो दूसरे का नर कैसे नज़र आएगा | यह नर सबकुछ नहीं हैं ,केवल आवरण है | भीतर का परमात्मा एक है |
जब भीतर का आत्मा का सूर्योदय होता है ,तो आत्मा के प्रकाश में सब भेद समाप्त हो जाते हैं ,सब आवरण लुप्त हो जाते हैं ; स्त्री - पुरुष का लिंगभेद समाप्त हो जाता है ,जाति और धर्म का आवरण समाप्त हो जाता है ,सुन्दर और बदसूरत का भेद समाप्त हो जाता है | ये सब शरीर के भेद हैं ,आत्मा तो एक ही है |
हि.स.यो.३/६०
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