सदगुरु की शक्त्ति उनके नाम में होती है

डाक्टर बाबा ने आगे बताना प्रारंभ किया," सदगुरु की शक्त्ति उनके नाम में होती है,इसलिए भारतीय संस्कृति में नाम को अधिक महत्व दिया गया है।सदगुरु जो साधना करते हैं,उससे उनके आसपास एक आभामण्डल बन जाता है और ऐसा ही आभामण्डल ,हम अगर संपूर्ण श्रद्धा और विश्वास से उनका नाम भी लें तो हमारे आसपास भी निर्मित हो जाता है। क्योंकि सद्गुरु के नाम के कारण हम उनकी शक्तियों से जुड़ते हैं जो शक्तियाँ सद्गुरु की आत्मा की होती हैं। नाम सदा आत्मा का ही होता है,शरीर तो खोल है,शरीर तो आत्मा का आवरण है।हम सद्गुरु का हृदय से,श्रद्धा से नाम लेते हैं तो वह सद्गुरु के शरीररूपी खोल का नहीं लेते हैं,वह उसके भीतर स्थिति उसकी आत्मा का होता है। और आत्मा की गुरुशक्त्तियों का        संरक्षण हमें अनायास  ही प्राप्त हो जाता है। सद्गुरु के शरीर से बड़ा उनका सूक्ष्म शरीर होता है जो
गुरुशक्त्तियों से निर्मित होता है। वह शरीर कभी भी  नष्ट नहीं होता है और उस शरीर से कभी भी ,कहीं भी संपर्क किया जा सकता है। इन गुरुशक्त्तियों के कारण ही सद्गुरु का शरीर ' सद्गुरु ' कहलाता है। लेकिन वास्तव में,सद्गुरु का शरीर सद्गुरु नहीं होता है, सद्गुरु का शरीर तो गुरुशक्त्तियों का खोल होता है।सद्गुरु का शरीर तो उन गुरुशक्त्तियों का माध्यममात्र होता है।और सद्गुरु भी अपने शरीर को माध्यम ही मानते हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि से देखा जाए जो दिखता है,वह माध्यम ही है और जो अनुभूति होती हैं,वे गुरुशक्त्तियाँ ही हैं। सामान्य मनुष्य माध्यम के बिना सरलता से गुरुशक्त्तियों तक नहीं पहुँच सकता है। इसलिए सामान्य मनुष्य  माध्यम का सहारा लेता है। जो शिष्य माध्यम के बिना,अंतर्मन से
ही गुरुशक्त्तियों तक पहुँच सकता है, उसके लिए सद्गुरुशरीररूपी
माध्यम आवश्यक नहीं होता है। वह सद्गुरु के केवल नाम  के  माध्यम
से उन गुरुशक्त्तियों तक सीधा पहुँच जाता है।इसलिए नाम का मार्ग सीधा है। लेकिन उसके लिए शुध्द चित्त , संपूर्ण विश्वास और श्रद्धा की आवश्यकता होती है।"...

हि.स.यो-४             
पु-४१०

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