पुरुष के शरीर की संरचना और स्त्री के शरीर की संरचना में अंतर

पुरुष के शरीर की संरचना और स्त्री के शरीर की संरचना में अंतर है | और इसी संरचना के कारण भेद है स्वभाव का | स्वभाव शरीर से सम्बंधित है |

पुरुष में अहंकार की प्रधानता होती है | यह अहंकार पुरुष शरीर का मूल स्वभाव है | कर्त्ता का अहंकार पुरुष में इसलिए अधिक होता है क्योंकि वह कार्य को अधिक प्रधानता देता है | कार्य की प्रधानता पुरुष शरीर का स्वभाव है ,पर यह कार्य करने की शक्ति ,यह कार्य करने की प्रेरणा उसे स्त्री के माध्यम से ही मिलती है |

स्त्री का शरीर भावनाप्रधान होता है | भावना प्रधानता के कारण उनमे समर्पण का भाव अधिक होता है | इसलिए उनकी गुण ग्राहकता अधिक होती है | वह शक्तियां ग्रहण कर सकती हैं और शक्तियां ग्रहण कर उन्हें क्रियान्वित करने के लिए पुरुष को प्रेरित कर सकती है | यही कारण है की प्रत्येक सफल पुरुष की प्रेरणा कोई ना कोई स्त्री ही होती है |

सर्वस्व देने की क्षमता जितनी स्त्री में होती है उतनी पुरुष में नहीं होती है | क्योंकि देना उसका दूसरा सिरा है और पाना उसका पहला सिरा है | जो सर्वस्व पा सकता है वही सर्वस्व दे सकता है | यह स्त्री शरीर का मूल स्वभाव है |

और जब तक पुरुष भी स्त्री के मूल स्वभाव तक नहीं पहुँचता ,तब तक वह सद्गुरु नहीं हो सकता | और जब तक आत्मस्वरूप नहीं होता , वह दूसरी आत्मा को जन्म नहीं दे सकता है | गुरु को भी शिष्य को जन्म देना पड़ता है |--सद्गुरु जब स्त्री बनता है ,जब सद्गुरु का स्वभाव भी स्त्री के समान कोमल और दात्री जैसा होता है ,तभी वह किसी शिष्य को जन्म दे सकता है |

हि.स.यो.३/६१

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