मन ध्यान में भी बाहर ही भटकेगा

मन का विरोध। हम शरीर को एक निच्छित समय पर , एक निच्छित स्थान पर रख सकते हैं। लेकिन अपने मन पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। और हमारा मन दुनियाभर में भटकते रहता है। मन अस्थिर होता है , चंचल होता है और यही कारण है कि हम अपने शरीर को एक स्थान पर रख लें लेकिन मन फिर भी भटकते ही रहता है। यह ठीक वैसी ही स्थिति है - पानी भरे गिलास को धुमाते रहे तो भीतर का पानी कभी भी स्थिति नहीं होगी। पानी को अगर स्थिर करना है तो पानी भरे गिलास को एक ही स्थान पर स्थिर करके रखना ही होगा। इसलिए एक निच्छित स्थान पर ध्यान के लिए बेठना ही होगा। कुछ दिन आपका मन ध्यान में भी बाहर ही भटकेगा और फिर भी आप बैठ रहे तो फिर आपको ध्यान न करने की सलाह भी देगा। 

भाग ६ - ७२

Comments

Popular posts from this blog

Subtle Body (Sukshma Sharir) of Sadguru Shree Shivkrupanand Swami

Shivkrupanand Swami