प्रत्येक विचार की निर्मिति मनुष्य के ध्वारा ही होती हैं

प्रत्येक विचार की निर्मिति मनुष्य के ध्वारा ही होती हैं क्योंकि प्रकृति के कोई अपने विचार नहीं होते हैं | विचार ही अप्राकृतिक हैं | इसलिए जैसे ही हम प्रकृति में जाते हैं, स्वयं ही हमारे विचार बन्द हो जाते हैं | और विचार अधिकतर किसी-न-किसी मनुष्य से जुड़ा होता हैं | इसी कारण हम जब भी विचार करते हैं तो वह विचार किसी मनुष्य से सम्बन्धित होगा | और जब हमारा चित उस विचार के माध्यम से उस व्यकित पर जाएगा तो उस व्यकित के आभामण्डल का, उसके विचारो ं का, उस समय की उसकी स्थिति का प्रभाव भी हमारे ऊपर पड़ेगा | और केवल एक विचार से अनेक विचारो की शृंखला ही शुरु हो जाएगी | और  प्रत्येक विचार मनुष्य को  अपने स्वंय की ग्रहण करने की क्षमता से अलग करता हैं | यानी एक निर्विचार मनुष्य आसपास के वातवरण से विश्वचैतन्य ग्रहण करता रहता है |

हि.स.यो-४

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