आध्यातमिक बैठक बनाए बिना सामूहिकता में शामिल नहीं हो सकते हैं।
" एक आध्यात्मिक स्थिति बनाए बिना, एक आध्यातमिक बैठक बनाए बिना सामूहिकता में शामिल नहीं हो सकते हैं।सामूहिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पूर्व पुण्यकर्म की आवश्यकता होती है और गुरु के साथ पूर्वजन्म का संबंध होना चाहिए। प्रत्येक जन्म के साथ शरीर के रिश्ते बदलते रहते हैं लेकिन आत्मा के आत्मा के साथ के संबंध बने ही रहते हैं। सबसे करीब का रिश्ता गुरु और शिष्य का होता है क्योंकि यह जन्म के रिश्तों के साथ नहीं होता, आत्मा ने आत्मा को पहचानकर स्वयं बनाया हुआ रहता है। यह शरीर से नहीं बना होता, आत्मा ने माना हुआ होता है। और मानना आत्मा का भाव है,उस भाव से बना यह रिश्ता होता है।गुरु के साथ शिष्यों की सामूहिकता ही सबसे बड़ी सामूहिकता है क्योंकि ऐसी सामूहिकता में एक प्रक्रिया घटित होती रहती है--शिष्य गुरु शक्तियाँ ग्रहण करते रहते हैं और वे उन्हें बाँटते रहते हैं।यह दृश्य जीवन में देखे तो भी एक चैतन्य की अनुभूति होती है। ' देना ' सदगुरु का स्वभाव होता ही है पर जब शिष्य का स्वभाव
' लेंना ' हो जाता है तो चैतन्य की धारा बहती रहती है।उस सामूहिकता में एक आत्मीय समाधान देना और एक आत्मीय समाधान पाना होता है। यानी एक आत्मीय समाधान की सामूहिकता वहा निर्मित हो जाती है। एक ही प्रकार से सारे साधक अपने आभामण्डलों से एक माला-सी बनाते हैं,मानो फूलों का हार किसी मूर्ति के लिए बनाया गया हो और सबके भीतर से खुशुबू का एक प्रवाह अविरत बहने लग जाता है और सारा माहौल ही यादगार बन जाता है। ऐसे सामूहिकता के कार्यक्रम जब आत्मा अनुभव करती है तो आत्मा की आध्यात्मिक प्रगति होने लगती है।".....
हि.स.यो-४
पु-३३५
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