शिव यानी मनुष्य के शरीर का आत्मा

शिव  यानी  मनुष्य के  शरीर  का  आत्मा । उस  आत्मा  का  प्रभुत्व  शरीर  पर  कितना  है,  वह  आत्मा  शरीर के  अधीन है  या शरीर आत्मा के अधीन है ,  इसी  बात पर  सारा  संतुलन निभ॔र  होता है । अगर  मनुष्य  का शरीर  आत्मा  के  अधीन  है,  इसका  अथ॔ है कि  आत्मा अपने  मुल स्वरुप  में है,  पवित्र है । और  आत्मा  पवित्र है,  तो चित्त भी  पवित्र  होगा  क्यों कि  चित्त  तो  आत्मा का ही  प्रकाश  है। तो ऐसे  मनुष्य  का जीवन  संतुलित होगा,  सुरक्षित होगा  और  उसके  जीवन मे  गति के  साथ साथ  ठहराव भी  होगा । यानी  वह  व्यक्ती  एक  निश्चित ,  नियंत्रित  गती  से ही  जीवन  मे  आगे  बढेगा  और  संतुलित  होते  हुए  अपने  जिवन  मे  अपने  आत्मा  द्वारा  निर्धारित  किए  गए  लक्ष्य  तक  पहुँचेगा और  जीवन  मे  आत्म सुख पाकर  आत्मानंद  पाएगा  क्योंकि  उसकी  गति  पर  उसके  आत्मा  का  पूण॔  नियंत्रण  होगा । और  दुसरा  मनुष्य  वह  है,  जिसके  शरीर  का  प्रभुत्व उसकि  आत्मा  पर होता है ।उसके  भीतर  उसकी  आत्मा  का  अस्तित्व  नगण्य  सा  होता है ।इसलिए  उसका  शरीर ,  उसका  मन  जैसा  चाहता है,  वह वैसा ही  करता है। वह  चाहे  उतनी  गती  से  भागता  है  और  गती  ही  उसकी  दुघर्टना  का  कारण  बनती है । उसका  गती पर  कोई  नियंत्रण  नही  होता  क्योंकि  वह गति  को  ही  प्रगति  समझता है ।वास्तव  मे ,  गति  यानी  केवल  आगे ,  और  आगे  बढना है  और प्रगति  यानी  संतुलित  विकास की प्रक्रिया  है । मनुष्य  के  जीवन  मे  गती  घातक  है,  प्रगति  नही  क्योंकि  प्रगति  मे गती  के  साथ साथ  संतुलन  भी  जुडा  होता है,  ठहराव जुडा  होता है

Hksy  part 2
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