चैतन्य

ये  शरीररूपी  वस्त्र  निकालकर  फेंक  दो , तो  ऑटोमेटिकलि  आत्मा  रूपी  एहसास  में  कोई  दाग  नही  है , कोई  दोष  नही  है , कोई  ईर्षा  नही  है , कोई  अहंकार  नही  है , कोई  लोभ  नही  है , कुछ  नही  है , कोई  व्यवहार  नही  है । कुछ  नही  है ,  एकदम  शून्य ! एकदम  खाली । चैतन्य , चैतन्य  और  चैतन्य , सिर्फ  चैतन्य  है  और  कुछ  नही  है । उस  चैतन्य  का  आनंद  लो  ये  मेरी  शुद्ध  इच्छा  है , नमस्कार !

    परमपूज्य गुरुदेव
       गुरुपुर्णिमा
         २०१४
          

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