सामूहिकता
" ' सामूहिकता ' से हमारा अर्थ उस पवित्र आत्माओं के समूह से है जो आपस में एक-दूसरे को जानते हैं। इनका साथ एक जन्म का नहीं है,जन्मों-जन्मों का है। ये केवल शरीर से एकत्र नहीं हुए हैं,इनकी आत्माएँ भी जुड़ी हुई हैं,इनका समर्पण भी एक है,इनका परमात्मा का माध्यम भी एक है। ये वे छोटी-छोटी नदियाँ हैं जो एक ही बड़ी नदी में समाहित हो गई हैं। अब ये छोटी नदियाँ नहीं रहीं,बड़ी नदी का रूप ले चुकी हैं। इनके शरीर अलग-अलग हो सकते हैं,इनकी आत्मा एकरूप है। इन सबमें एक आत्मीय संबंध है। ये मोती नहीं हैं,मोतियों की माला हैं। इनके बीच सदगुरु रूपी अदृश्य धागा है जो इन सभी आत्माओं को बाँधे हुए है। इन सब मनुष्यों की स्थिति निर्विचारता की हो गई है,इन्हें कोई विचार ही नहीं आते हैं। ये सब जागृत आत्माएँ हैं जो जानती हैं--हमारा यह जन्म केवल मोक्ष की स्थिति पाने के लिए हुआ है। ऐसे एक लक्ष्य को लेकर इकट्ठा हुए आत्माओं के समूह को सामूहिकता कहते हैं। इस सामूहिकता में ही परमात्मा का अनुभव होता है। समूचे चैतन्य के माध्यम से प्रत्येक आत्मा परमात्मा की शक्त्ति को महसूस करते रहती है। वे मनुष्य अपने भीतर सकारात्मक बदलाव करने के लिए एकत्र हुए रहते हैं। "
" सामूहिकता में सदा सृजनात्मक कार्य समपन्न होते हैं,सामूहिकता में सदा प्रगति ही होती रहती है। सामूहिकता का अवसर मनुष्य को कभी नहीं खोना चाहिए।सामूहिकता में पहुँचा नहीं जाता,आत्मा को सामूहिकता के प्रति गुरुशक्तियाँ आकर्षित कराती हैं। वे आमंत्रित करती हैं।लेकिन वह आमंत्रण उन्ही आत्माओं तक पहुँचता है जो उसके योग्य होती हैं। "....
हि.स.यो-४
पु-३३४
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