बिना सामूहिक प्रयास के समाज में तो ध्यान असंभव ही है
बिना सामूहिक प्रयास के समाज में तो ध्यान असंभव ही है,ऐसा मुझे उनकी बातों से लगा।मुझे लगा-जब यहाँ एकांत में,जंगल में,इस उच्च शिखर पर ,इतनी अच्छि और बड़ी सामूहिकता में मोक्ष की स्थिति को बनाए रखना कठिन है तो समाज में तो बिना सामूहिक प्रयास के कभी संभव ही नहीं है।
" वे आगे बोले,"
' सामूहिकता ' का अर्थ भीड़ नहीं है। भीड़ का कोई निश्चित उद्देश नहीं होता है और न उस पर किसी का नियंत्रण होता है।मनुष्य केवल शरीर से एकत्र होते हैं। इस भीड़ में आनेवाले मनुष्यों के अलग-अलग उद्देश होते हैं।और जैसे ही अवसर मिलता है,वैसे ही वे अपने उद्देश पूर्ण करते हैं।भीड़ में शरीर को प्रधानता होती हैं।.....
हि.स.यो-४
पु-३३३
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