धर्म
सभी धर्म मनुष्य के भीतर की मनुष्यता इसलिए जगाना चाहते थे ताकि मनुष्य को वह ईश्वरीय अनुभूति हो सके। लेकिन वह ईश्वरीय अनुभूति रह गई बाजु में, लोग उस पवित्र, शुद्ध मनुष्यता की स्थिति तक भी नहीं पहुँच सके। क्योंकि धर्म का इस्तेमाल सदैव अपने, निजी अधिकारों और अपनी सुविधा, अपनी व्यवस्था करने के लिए किया जाता रहा है। और यह इसलिए हो पा रहा है क्योंकि किसी को ईश्वरीय अनुभूति ही नहीं है। क्योंकि अगर अनुभूति हो, तो वह जान सकता है कि सचमुच धर्म यह कह रहा है या यह सामनेवाला व्यक्ति अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए यह कह रहा है। लेकिन यह तब तक नहीं होगा, जब तक अनुभूति पर आधारित धर्म नहीं होंगे। ...।ईश्वरीय अनुभूति एक ही है क्योंकि ईश्वर ही एक है।
हि.स.यो.३/२८५
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