हम जब किसी घर में जन्म लेते हैं, तो कई ऋण होते हैं- पितृऋण , मातृऋण , अन्य रिश्तों के ऋण
" हम जब किसी घर में जन्म लेते हैं, तो कई ऋण होते हैं- पितृऋण , मातृऋण , अन्य रिश्तों के ऋण | हम जब तक वे सब नहीं उतारते, हम उनमें से मुक्त नहीं होते हैं | और जब तक मुक्त नहीं होते, हम आगे बढ़ नहीं पाते हैं | ये सब जीवन की घटनाएँ हैं, होती ही रहती हैं | वे घटनाएँ भी सब निमित हैं | वे नहीं होगीं तो जीवन आगे कैसे बढ़ेगा? इसी को ही तो जीवन कहते हैं | तू तो नियमित ध्यान कर | ध्यान सदैव तुझे संतुलन देगा और संतुलन ही समाधान प्रदान करेगा और समाधान के कारण तू सदैव शाश्वत सुख को जान पाएगा और फिर सदैव शाश्वत सुख को ही ग्रहण करता रहेगा | एक बार किसी ने शाश्वत सुख के आनंद को प्राप्त कर लिया, तो फिर उसका ध्यान कभी शारीरिक सुखों की ओर नहीं जाता है |"
भाग- 2
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