वाणी में चैतन्य

 सामान्य मनुष्य जो बोलता है , उसके पूर्व विचार करता है। यानी स्वाधिष्ठान चक्र से संबंध होता है और वह कण्ठ से बोलता है। यानी स्वाधिष्ठान और विशुद्धि ये दो चकों से ही बोलता है। बाकी चक्र उसमे शामिल नहीं होते हैं। इसीलिए केवल दो चकों की ऊर्जा का ही प्रभाव पड़ता है। यानी सोचना और बोलना , बस। दूसरा , वह जब सोचता है तो क्या सोचता है कि यह मैंने किस ग्रथ में पठा है , किस  पुस्तक में पठा है। यानी अनजाने में उनका ध्यान पुस्तक पर ही जाता है। यानी चित्त पुस्तक पर होता है , बोलना कण्ठ से है , यानी विशुद्ध चक्र और सोचता स्वाधिष्ठान चक्र से है। और पुस्तक तो निर्जीव वस्तु है तो निर्जीव वस्तु पर अगर चित्त रखकर बोलेंगे तो वाणी में चैतन्य कहाँ से आएगा? मैं तो मेरे गुरुदेव के चरणों पर चित्त रखकर बोलता हूँ। वे तो सामान्य मनुष्य ही थे लेकिन मेरे लिए वही भगवान थे। क्योंकि परमात्मा ने उनके माध्यम को अपनाकर मुझे अनुभूति कराई थी।

भाग- ६- १४६

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