क्या निरंतर ध्यान वैराग्य की ओर ले जाता है?

*पत्रकार:* क्या निरंतर ध्यान वैराग्य की ओर ले जाता है?
*स्वामीजी:* ध्यान और वैराग्य अलग-अलग हैं। निरंतर ध्यान तो इसी परिवार , संसार, समाज में जीने की कला सिखात है
और परमात्मा की अनुभूति कराता है। कमल के समान संसाररूपी सागर में रहकर आध्यात्मिकता का कमल खिलाना है।

*मधुचैतन्य जन.२००९/३८*

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