धर्म
धर्म का ज्ञान हमें जन्म लेने के बाद जिस परिवार में जन्म लिया वहाँ बाहरी रूप से प्राप्त होता है। और आध्यात्मिक ज्ञान तो हम जन्मों-जन्मों से अपने साथ लेकर ही चलते हैं। हिमालय के ऋषी-मुनि बाहरी धर्म को अधिक महत्व इसलिए भी नहीं देते थे क्योंकि 'धर्म' तो प्रत्येक जन्म के साथ बदलते रहता है। जो अस्थाई है उसे क्या महत्व देना! वे आध्यात्मिक ज्ञान को महत्व देते थे। वह जन्म के साथ-साथ चलता भी है और उसमें प्रत्येक जन्म में प्रगति होते ही रहती है। इस आध्यात्मिक ज्ञान से ही मनुष्य का सूक्ष्म शरीर निर्माण होता है और प्रत्येक जन्म में उसके साथ-साथ चलता भी है। तब तक चलता है जब तक उसे मोक्ष की स्थिति नहीं मिलती।
*आत्मेश्वर(आत्मा ही ईश्वर है।) पृष्ठ:३३*
*॥जय बाबा स्वामी॥*
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