सूर्य तथा चंद्र पर चित्त

हमारी संस्कृति में सूर्य को अर्घ्य समर्पित किया जाता है तथा कृष्णपक्ष की चतुर्थी का व्रत रखकर चंद्रोदय के बाद ही भोजन ग्रहण किया जाता है। जब हम चंद्रोदय का इंतजार करते हैं , तब हमारा चित्त चंद्रमा पर रहता है तथा हमारी चंद्रनाडी शुद्ध होती है।  उसी प्रकार से पूर्णिमा के दिन सत्यनारायण की पूजा भी की जाती है।
रोज प्रातःकाल में नहाकर हम अर्घ्य अर्पित करते हैं , तब हमारा चित्त शुद्ध होता है और हमारी सूर्यनाड़ी शुद्ध होती है।
सूर्य तथा चंद्र शाश्वत हैं। प्रतिदिन हमारा चित्त शाश्वत वस्तुओं पर होगा , तब हमारा चित्त सशक्त बनेगा क्योंकि चित्त शाश्वत पर है, नाशवान वस्तुओं पर नहीं।
दिन का कुछ समय सूर्य तथा चंद्र पर चित्त रखकर देखें - कितना सकारात्मक परिणाम आता है !

*मधुचैतन्य जुलाई २००६*
*॥जय बाबा स्वामी॥*

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