आभामंडल
"मनुष्य जीवन में जैसे भी *विचार करता है* उन सब का *प्रभाव* उसके *आभामंडल* पर पड़ता है मनुष्य के इन *विचारों से मनुष्य का आभामंडल* बनता है *अच्छे या बुरे कर्मों* का *प्रभाव* उसके आभामंडल पर पड़ता है और इस प्रभाव की *किरणें अंदर से बाहर* की ओर ही होती है और इसलिए वह अपने *आभामंडल से आसपास* के वातावरण को *प्रभावित* करता है आभामंडल का यह *अच्छा या बुरा प्रभाव बना* ही रहता है और उस *प्रकाश* में और उसके *प्रभाव* से उस मनुष्य के द्वारा किए गए *कार्यों से बदलाव* होता रहता है और ना ही *रंग शाश्वत होते हैं* और *ना ही रंग का यह प्रभाव शाश्वत होता है।"
हिकासयो.३ पे.३९८
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